स्वामी दयानन्द सरस्वती
स्वामी दयानन्द सरस्वतीकृत ग्रन्थों का संक्षिप्त परिचय

(१) ऋग्वेदभाष्य- इसमें मूलमन्त्र, पदपाठ, संस्कृत में पदार्थभाष्य, अन्वय और भावार्थ देकर पुनः आर्यभाषा में अन्वयानुसार अर्थ और भावार्थ दे दिया गया है। महर्षि ने तो केवल संस्कृत भाषा की रचना की थी। उसकी भाषा पण्डितों ने बनाई है। यह भाष्य केवल मण्डल ७। सूक्त ६१ । मं० २ तक ही हुआ है। ऋषि दयानन्द अपने जीवन-काल में इसे समाप्त नहीं कर सके।

(२) यजुर्वेदभाष्य- इसमें ऋग्वेद के समान ही मूलमन्त्र, पदपाठ, पदार्थभाष्य, अन्वय, भावार्थ संस्कृत में और आर्यभाषा में अन्वयानुसार अर्थ और भावार्थ दिये गये हैं।

(३) यजुर्वेद भाषा-भाष्य- इसमें ऋषि दयानन्द रचित संस्कृतभाग को हटाकर केवल भाषा में अन्वयानुसारी पदार्थ और भावार्थ संकलित किया गया है।

(४) ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका- ऋषि दयानन्द जिस वेदभाष्य की रचना कर रहे थे उसकी यह भूमिका है। यह सम्पूर्ण संस्कृत में है और इसका अनुवाद आर्यभाषा में भी किया गया है। वेद की उत्पत्ति, रचना, प्रामाण्य-आ ण्य, वेदोक्त धर्म आदि अनेक विषयों पर स्पष्ट विचार किया गया है। पूर्व के वेदभाष्यकारों के अनेक अनार्ष मतों का विवेचन करके सप्रमाण वैदिक आर्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। वेद के सिद्धान्तों को समझाने के लिए यह ग्रन्थ अपूर्व है।

(५) सत्यार्थप्रकाश- इस ग्रन्थ में १४ समुल्लास हैं। प्रथम १० समुल्लासों में आर्य वैदिक सिद्धान्तों का युक्ति, तर्क और वेद, शास्त्र, दर्शनों और स्मृति के आधार पर मण्डन किया गया है और पिछले ४ समुल्लासों में आर्यावर्तीय मतों और बाइबिल और कुरान के मतों की समीक्षा की गई है। यह एक युगान्तरकारी-पुस्तक है, इसने भारतवर्ष में जनता की विचार-धारा को ही परिवर्तित कर दिया है।

(६) संस्कार-विधि- इसमें गृह्यसूत्रों के अनुसार गर्भाधान से अन्त्येष्टि कर्म तक १६ संस्कारों को वैदिक रीति के अनुसार करने की पद्धति और वर्णों और आश्रमों के नित्य धर्म-कर्मों का विधान किया गया है।

(७) आर्याभिविनय- इस ग्रन्थ में ऋषि ने ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना के लिए दो वेदों से कुछ मन्त्रों का संग्रह करके उनको अर्थसहित दिया है।

(८) पञ्चमहायज्ञविधि- इसमें ऋषि ने सन्ध्या (ब्रह्मयज्ञ), अग्निहोत्र (देवयज्ञ) बलिवैश्वदेव (भूतयज्ञ) पितृयज्ञ और अतिथियज्ञ इन पाँचों के करने की विधि और मन्त्रों पर संस्कृत भाष्य और सरल अनुवाद भी दिया है।

(९) संस्कृत-वाक्यप्रबोध- संस्कृत की आरम्भिक शिक्षा के लिए व्यावहारिक विषयों पर सरल संस्कृत वाक्यों द्वारा बालकों को शिक्षा दी गई है। इससे संस्कृत वाक्यों का सुगमता से बोध हो जाता है।

(१०) व्यवहारभानु- बालकों को शिष्ट बनाने, आर्यव्यवहार की शिक्षा देने और अज्ञान की कुशिक्षा का निवारण करने के लिए इस ग्रन्थ की रचना हुई है।

(११) शास्त्रार्थ-काशी- इसमें काशी में श्री विशुद्धानन्द आदि २७ पण्डितों के साथ ऋषि दयानन्द का जो शास्त्रार्थ हुआ था उसका विवरण दिया गया है। जो इस 'जीवन-चरित' में पृष्ठ १७६ से १८४ तक है। यह ग्रन्थ संस्कृत में है। इसका भाषानुवाद भी साथ ही है। 

(१२) वेदविरुद्धमतखण्डनम्- इस ग्रन्थ में वल्लभ आदि मतों के प्रति प्रश्न और उनका खण्डन किया गया है। यह ग्रन्थ संस्कृत में है और इसका अनुवाद हिन्दी में पण्डित भीमसेन शर्मा ने किया है।

(१३) शिक्षापत्री-ध्वान्तनिवारणम्- इस ग्रन्थ में सहजानन्द आदि के मतों का खण्डन किया गया है। यह ग्रन्थ भी संस्कृत में है। इसका हिन्दी अनुवाद 'स्वामी नारायणमत-खण्डन' के नाम से प्रसिद्ध है।

(१४) भ्रमोच्छेदन- इस ग्रन्थ में बनारस के राजा शिवप्रसादजी की ओर से श्री स्वामी विशुद्धानन्द की प्रश्नावली के कारण उत्पन्न हुए भ्रम को दूर किया गया है। उक्त भ्रमोच्छेदन के उत्तर में राजाजी के दूसरे निवेदन के उत्तर में पण्डित भीमसेन का उत्तर अनुभ्रमोच्छेदन नाम से छपा है।

(१५) भ्रान्ति-निवारण- इस ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द ने अपने वेदभाष्य पर पं० महेशचन्द्र न्यायरत्न (आफिशियेटिङ्ग प्रिंसिपल संस्कृत कालेज कलकत्ता) के किये भ्रान्ति-युक्त आक्षेपों का खण्डन किया है। यह ग्रन्थ संस्कृत में है, साथ ही अनुवाद भी दिया गया है। 

(१६) वेदान्त-ध्वान्तनिवारणम्- इस ग्रन्थ में नवीनवेदान्त के मत का अच्छी प्रकार विवेचन किया गया है।

(१७) सत्य धर्मविचार ( मेला चाँदापुर)- चाँदापुर के मेले के अवसर पर धर्मचर्चा करने के लिए जो आर्य, ईसाई और मुसलमानों के बड़े-बड़े विद्वान् सत्य निर्णय के लिए एकत्र हुए थे उसका विस्तृत विवरण इस जीवन-चरित में पृष्ठ में है। -

(१८) आर्योद्देश्यरत्नमाला- इस ग्रन्थ में आर्यों के १०० उद्देश्यों का संग्रह किया गया है। (१९) गोकरुणानिधि- इस ग्रन्थ में स्वामीजी ने गौ आदि उपकारी पशुओं का वध बन्द करने और उनके पालने पर बल दिया है। गौ आदि पशुओं की ओर से एक प्रकार से मर्मस्पर्शी अपील है। इसके अन्त में गो-कृष्यादि-रक्षिणी की योजना भी सम्मिलित है।

(२०) वेदाङ्गप्रकाश- पाणिनीय व्याकरण के प्रक्रिया-भाग को स्पष्ट करने के लिए लौकिक और वैदिक व्याकरण को अंशों के साथ लेकर भाषा में व्याकरण के विषय को अति सुगम कर दिया है। सिद्धान्त कौमुदी आदि अनार्ष ग्रन्थों के भीतर आयी अनेक अवैदिक अनार्ष बातों को दूर करके व्याकरण को स्वच्छ कर दिया है और भट्टोजी दीक्षित आदि की अनेक त्रुटियों को भी दर्शाया है।

वेदाङ्गप्रकाश में वेदार्थ को स्पष्ट करनेवाले इतने ग्रन्थों का समावेश है -

१. वर्णोच्चारण शिक्षा ९. स्त्रैणताद्धित
२. नामिक १०. धातुपाठ
३. सन्धिविषय ११. अव्ययार्थ
४. कारकीय १२. गणपाठ
५. सामासिक १३. उणादिकोष
६. सौवर १४. निघण्टु
७. आख्यातिक १५. निरुक्तम्
८. पारिभाषिक  


(२१) अष्टाध्यायी-भाष्यम्- पाणिनीय अष्टाध्यायी के ऊपर सूत्र क्रमानुसार ऋषि दयानन्द का यह अति उत्तम भाष्य है। इसका प्रकाशन उनके जीवनकाल में न हो सका। लाहौर के पण्डित डॉ० श्रीरघुवीर एम०ए० (डी०लिट) द्वारा सम्पादित कराकर श्रीमती परोपकारिणी सभा ने इसको दो भागों में प्रकाशित किया है। यह भाष्य स्थान-स्थान पर खण्डित है। बड़े खेद से लिखना पड़ता है कि ऋषि दयानन्द के इस अमूल्य ग्रन्थ की रक्षा यत्नपूर्वक नहीं की गई। इस भाष्य में ही दीक्षित और काशिकाकार जयादित्य आदि की व्याकरण विषयक अनेक त्रुटियाँ दर्शाई हैं। संस्कृत व्याकरण के क्षेत्र में यह एक अद्भुत पुस्तक है। ।इस खण्डों में पठन-पाठन विषय में एक विशेष क्रम है उस क्रम से पढ़ने से व्याकरण और संस्कृत विद्या और वेदविद्या का विशेषरूप से बोध हो जाता है। 

इसके अतिरिक्त- स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश सत्यार्थप्रकाश के अन्त में तथा पृथक् भी प्रकाशित होता है। इसी प्रकार 'स्वीकार-पत्र' 'आर्यसमाज के नियम' भी पृथक् छपे हैं।

श्रीमती परोपकारणी सभा ने वेदभाष्य को छोड़कर समस्त ग्रन्थों को संकलित कर श्रीमद्दयानन्द जन्म शताब्दी के अवसर (संवत् १९८१ वि० अर्थात् १९२५ ई०) पर दो भागों में प्रकाशित किया था।
 

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